पूष की पंखुरियाँ

इक बार जो मैंने तुम्हें निहारा तो जी किया की तुम्हारे घुंघरेले बाल जो इस पूष की हवा में अक्सर बिखर जाते हैं, उन्हें सवार डालूं। सवारने का काम तो हमें अच्छी तरह से आता है - किसी ने सिखाया नहीं, पर फिर ये खोपड़ी में भरा दिमाग कह जाता है कि तुम्हें तो अपने… Continue reading पूष की पंखुरियाँ

कलियाँ बने पुष्प, पर तुम ना आई

२ दिन बदले २ साल में, और तुम्हारे हाथों से लगाए फूल अब तक मुरझाए नहीं| अब जब तुम हो नहीं तो तुम्हारे संग बिताये लम्हों की याद में हम उन्ही फूलों से मालें गूथते हैं - ना जाने कब तुम्हारे आने की खबर आ जाए और हम आस्तिक बनकर पत्थर की मूर्तियों पर माले… Continue reading कलियाँ बने पुष्प, पर तुम ना आई

तुम्हारी नज़रें मुझ पर पहरा डालतीं हैं

Art by Frank Frazetta

दुनिया से मैंने अपनी नज़रें चुराई तो वो तुम पर आ पड़ीं। और तुम इठलाते हुए, बलखाते हुए, इतराते हुए, अपनी ज़ुल्फ़ों को लहराते हुए वहां पर आई, और मुझे ऐसा लगा कि किसीने छेनी और हथौड़े से मेरे दिल में तुम्हारा चेहरा तराश दिया हो। अब तो बस ये मेरा दिल है जो तुम्हारा… Continue reading तुम्हारी नज़रें मुझ पर पहरा डालतीं हैं